एक पिता जिसकी कोई आमदनी नहीं है; अपनी बेटी को कैंसर से बचाने के लिए जूझ रहा है   | Milaap
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एक पिता जिसकी कोई आमदनी नहीं है; अपनी बेटी को कैंसर से बचाने के लिए जूझ रहा है  

 "सिर्फ एक महीने में हमारी जिंदगी जैसे रुक सी गई। सीमा और मुझे हमारी 5 साल की बच्ची अक्षयनी  के साथ हर वक़्त रहना पड़ता है। वो अब कम ही बोल पाती है। बस अपनी मासूम नज़रों  से हमें देखकर थोड़ा सा मुस्कुराती है। तोहफ़े और सरप्राइज भी अब उसे वो ख़ुशी नहीं दे पाते हैं। मुझे डर है कि मेरी छोटी सी गुड़िया अब कभी पहले जैसी नहीं हो पाएगी। मुझे ऐसा लगता है जैसे वो अभी से ही हमसे काफ़ी दूर जा चुकी है।."- सिद्धू, अक्षयनी के पिता ।  

 सिद्धू का मन यह मानने को बिलकुल भी तैयार नहीं था कि उसकी बच्ची को कैंसर है पर अलग अलग अस्पतालों की रिपोर्ट्स ने उसे इस कड़वी सच्चाई को मानने पर मजबूर कर दिया था।  

 
एक महीने पहले तक अक्षयनी  एक हँसती-खेलती प्यारी सी बच्ची थी।  वह दूसरी क्लास में पढ़ती थी और जब तक कि  कैंसर ने उसे पूरी तरह से जकड नही लिया था स्कूल जाना उसे  बेहद पसंद था। सिद्धू उन दिनों को बहुत याद करता है जब वो अपनी लाड़ली को स्कूल भेजने की भागदौड़ में लगा रहता था|  उसकी हँसी और शरारतें जैसे अब एक गुज़रा हुआ कल बन चुकी हैं।  

“महीने भर पहले मेरी नन्हीं सी बच्ची को खाँसी और तेज बुख़ार हुआ था। चूँकि, उस वक़्त मुंबई में बहुत बारिश हो रही थी तो मैंने सोचा ज़रूर उसे वायरल फीवर हुआ होगा।  मैं उसे एक साधारण से ब्लड टेस्ट के लिए ले गया। टेस्ट में पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है। यह बात मेरे लिए किसी झटके से कम नहीं थी, मैं  इसके लिए तैयार नहीं था। अभी भी मैं  पूरी तरह से सदमे में हूँ। मैं अक्षयनी  को 3  अलग-अलग डॉक्टर्स के पास ले गया, इस उम्मीद में कि शायद कोई तो मुझसे यह कहेगा कि ‘उसे कैंसर नहीं’ है। मगर ऐसा कभी नहीं हुआ।”  
 

मेरी नन्हीं सी मासूम बच्ची  को लगता है कि उसे एक छोटा सा ही  इन्फेक्शन हुआ है और वह जल्दी ही घर जा सकेगी/  
 

अक्षयनी  को एक दुर्लभ किस्म का  ब्लड कैंसर हुआ है जिसे हाई रिस्क फिलाडेल्फिया क्रोमोज़ोम पॉजिटिव कहते हैं।  उसकी व्हाइट ब्लड सेल्स (WBC) अब सिर्फ 4 लाख़ रह गई हैं  ( सामान्यतः इसकी गिनती करीब 45 बिलियन से 11 बिलियन प्रति माइक्रोलिटर होती है)। वो पूरा दिन थकी-थकी सी रहती है और अब ज्यादा बोलती भी नहीं है।  
 
“सीमा हमेशा अपनी बच्ची के सुन्दर बालों की बढ़ाई किया करती थी।  अक्षयनी  की कीमोथेरेपी शुरू हो चुकी है और आगे और भी होगी। उसके बाल भी झड़ना शुरू हो गए हैं। हर बार जब भी सीमा उसके बालों में कंघी करती है तो वह और भी रोने लगती है। वो इतनी छोटी है कि उसे ये समझाना कि उसे कैंसर है, हमारे लिए और भी मुश्किल है। उसे बस इतना ही पता है की उसे ब्लड इन्फेक्शनहुआ  है। कभी-कभी तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए मनाना बहुत मुश्किल हो जाता है।."
 

ह्रदय रोगी होने बावजूद, एक  माँ अपनी बच्ची  को कैंसर से बचाने के लिए जूझ रही है   


सिद्धू अपनी मासूम बेटी को बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है|  उसके इलाज़ के लिए मदद मांगने के लिए वो लगातार बारिश में भी इधर उधर भागता रहता है। सिर्फ़ कीमोथेरेपी अक्षयनी  को बचाने के लिए काफ़ी नहीं है, उसे बोन-मेरो ट्रांसप्लांट की भी ज़रुरत है।  
 
‘मेरी पत्नी सीमा खुद एक दिल की मरीज़  है। मैं हैरान हूँ कि अपनी बीमारी  के बावज़ूद उसने एक पल को  भी हिम्मत नहीं हारी   है। वो यह मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि हम यह नहीं कर सकते हैं। वो सबसे मजबूत है। वही एक है जो अक्षयनी  को अस्पताल चलने के लिए मनाती है। मैं जानता हूँ कि वो अंदर से टूट चुकी है फिर भी कहीं न कहीं से हमेशा हिम्मत जुटा लेती है।’  
 

कभी-कभी काफ़ी आमदनी होने के बाद भी कैंसर सब कुछ ले जाता है  सिद्धू को अपनी सेल्स वाली जॉब दो 


महीने पहले छोड़नी पड़ी थी।  अभी  वह नई जॉब की तलाश कर ही रहा था कि अक्षयनी  बीमार पड़  गई। अब उसके पास इतना भी समय नहीं है कि वो जॉब इंटरव्यू दे सके।  सीमा एक प्राइवेट फर्म में काम करती है और घर और अक्षयनी  के इलाज दोनों का खर्च उठाती है। सीमा का खुद का भी दिल की बीमारी का इलाज़ चल रहा है।  
 
"हम ऐसे हालातों में फंस चुके हैं जहाँ से हम खुद नहीं जानते हैं कि किधर जाना है। सिर्फ एक महीने में हम 7  लाख़ रुपये ख़र्च कर चुके हैं। हम हमेशा सोचते थे कि एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए हमारी कमाई काफ़ी है। पर फ़िर मुझे ये एहसास हुआ कि कैंसर आपसे आपका सबकुछ ले जा सकता है। हम अपनी नन्हीं सी बच्ची के लिए अपना सब कुछ देने को भी तैयार हैं मगर इतनी  बड़ी रकम कमाने में हमें सालों  लग जायेंगे। हम बस यह चाहते हैं कि  किसी भी कीमत पर हमारी अक्षयनी  बच जाए।”
   

आप कैसे मदद कर सकते हैं  


अक्षयनी एक दुर्लभ किस्म के रक्त कैंसर  से पीड़ित है।उसे कीमोथेरेपी और बोन-मेरो ट्रांसप्लांट से गुजरना होगा ताकि कैंसर उसे मार न सके। उसे बचाने के लिए 50 लाख रुपए की ज़रुरत है और उसके माता-पिता के लिए इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम करना बहुत मुश्किल है। 

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 The specifics of this case have been verified by the medical team at the concerned hospital. For any clarification on the treatment or associated costs, contact the campaign organizer or the medical team.

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