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    The Mooknayak
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    The Mooknayak

    from New Delhi, Delhi

Story

The most rigid and oldest-running social system in India is the caste system. This system keeps Dalits and Adivasis out of the main society, and considers them impure and ineligible for the social rights necessary to lead a basic life. Equal to the world's sixth largest country in terms of population (about 350 million), this society is completely missing from the Indian newsroom. According to an Oxfam 2019 report, none of the 121 leadership positions surveyed in the newsroom are held by people belonging to scheduled castes or scheduled tribes. As a Dalit woman, Meena Kotwal feels the lack of voices of Dalits, women, Adivasis, and the backward in the mainstream media, which is very important for social justice. Keeping these things in mind, Meena Kotwal launched an online portal, 'The Mooknayak' in the year 2021. This initiative, 'The Mooknayak' is dedicated to the marginalised and underprivileged people of India who work on the principle of Dr. Ambedkar and the Constitution. It is a platform that has started with the fight for proper representation of the voices of the voiceless and mainstreaming their challenges. Our YouTube channel, Mooknayak website, and social media accounts give voice to the issues of Dalits, women, Adivasis, and the backward.

Currently, a gender-based, anti-caste approach is very rare in the Indian media, and that is what we intend to provide through our journalism. Since India is a country where many caste and religious diversities are found, as a result, the Mooknayak team has kept this in mind. The Mooknayak team currently consists of ten people. In the team, care has been taken that people from different sections like Dalit, Adivasi, women, Muslims, and Christians should get full representation. We have many teammates who do not have a journalism degree but want to do something through journalism. But because of the other media organizations' being casteist, they did not get the opportunity. Our goal is to show not only the news of the marginalised society, but also to represent people from that society who have not previously had the opportunity.

We have very limited resources, but still, it has been our endeavour to bring more and more such news from the village and countryside that the mainstream media does not want to show. We first reported the story of the rape of a nine-year-old Dalit girl by upper-caste priests at the cremation ground in Delhi last year. The Mooknayak tries to make us go to the ground, showing us the person whose pain is there in his own words. But due to a lack of resources, The Mooknayak is not able to show that news often. If The Mooknayak has the resources, we will add more people to the team so that more such news can come from across the country. Also, for our team to do well and produce quality work in journalism, they need basic requirements like a phone, a camera, a mic, etc. They will be given good and respectable remuneration. They will have to cover the costs of travel, lodging, and food in order to bring the story  from afar. An office will be started for the Mooknayak team so that the team will be linked together and they will be taught the nuances. Every month, some new people will be taught the tricks of journalism.

It is our endeavour to create a platform where not only news is shown, but the wrestling spread in society should be ended through that news. The government and administration should be forced to listen to those people who have been ignored till date. Being the only Dalit woman-led organisation often hinders the progress of media houses as much as mine can. Mooknayak attempts to bring to light neglected narratives in a newsroom that is severely lacking in diversity. I hope you will help us on our journey!


भारत में सबसे कठोर और सबसे पुरानी चलने वाली एक सामाजिक व्यवस्था है जिसे जाति व्यवस्था कहा जाता है। यह व्यवस्था दलितों और आदिवासियों को मुख्य समाज से बाहर रखता है और उन्हें मूलभूत जीवन जीने  के लिए ज़रूरी सामाजिक अधिकारों के लिए अशुद्ध और अयोग्य मानता है।  जनसंख्या के मामले में दुनिया के छठे बड़े देश के बराबर (क़रीब  350 मिलियन), भारत का यह समाज भारतीय न्यूज़ रूम से बिलकुल ही ग़ायब है। ऑक्सफैम 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, न्यूज़रूम में सर्वेक्षण किए गए 121 नेतृत्व पदों में से कोई भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के पास नहीं है। एक दलित महिला के रूप में, मीना कोटवाल  मुख्यधारा के मीडिया में दलितों,  औरतों, आदिवासियों, पिछड़ों की आवाज की कमी महसूस करती हैं जो किसी भी सामाजिक न्याय के लिए बहुत ही ज़रूरी है। इन बातों को ध्यान में  रखते हुए मीना कोटवाल ने  साल  2021 में एक मीडिया वेंचर 'द मूकनायक' लॉन्च किया। यह पहल 'द मूकनायक' भारत के हाशिए पर पड़े और वंचित लोगों को समर्पित है जो डॉ. आंबेडकर और संविधान के सिद्धांतों पर काम करता है। यह एक ऐसा मंच है जो बेज़ुबानो की आवाज़ को उचित प्रतिनिधित्व और उनकी चुनौतियों को मुख्य धारा में शामिल करने की लड़ाई को लेकर शुरू हुआ है। हमारे  यूटूब चैनल, मूकनायक website और सोशल मीडिया अकाउंट्स दलितों,  औरतों, आदिवासियों, पिछड़ों की मुद्दों को आवाज़ देता है और उनके लिए समर्पित है।

वर्तमान में, भारतीय मीडिया में वंचित/शोषित और हाशिए पर खड़े लोगों की वास्तविक रिपोर्टिंग बहुत दुर्लभ है, और यही हम अपनी पत्रकारिता के माध्यम से प्रदान करने का इरादा रखते हैं। चूँकि भारत एक ऐसा देश है जहां कई जाति-धर्म की विविधताएँ पाई जाती हैं, इसलिए द मूकनायक की टीम में इसे ध्यान में रखा गया है. द मूकनायक की टीम में फ़िलहाल 10 लोग हैं।  टीम में दलित, आदिवासी, महिला, मुस्लिम, ईसाई, QUEER समुदाय जैसे अलग-अलग वर्ग के लोगों को पूरा प्रतिनिधित्व मिले, इस बात का ख़्याल रखा गया है। हमारे टीम के कई साथी हैं, जिनपर पत्रकारिता की डिग्री नहीं है लेकिन वे पत्रकारिता के ज़रिये कुछ करना चाहते हैं। लेकिन दूसरे मीडिया संस्थान जातिवादी होने के कारण उन्हें मौक़े नहीं मिले। हमारी कोशिश है कि हाशिये पर खड़े समाज की ना केवल ख़बरों को दिखाया जाए बल्कि उस समाज के लोगों को भी जोड़ा जाए जिन्हें आज तक मौक़ा भी नहीं मिला.
 
हमारे पास बहुत ही सीमित संसाधन है लेकिन फिर भी हमारी कोशिश रही है कि गाँव-देहात से अधिक से अधिक ऐसी ख़बरें आए जो मुख्यधारा का मीडिया दिखाना नहीं चाहता। पिछले साल दिल्ली में  श्मशान घाट पर उच्च जाति के पुजारी द्वारा नौ साल की दलित लड़की के साथ रेप की घटना को हमने सबसे पहले रिपोर्ट किया था । चाहे हाथरस हो या आसिफ का मामला या फिर डोम समाज के साथ अछूतों जैसा व्यवहार, द मूकनायक ने उन मुद्दों को प्राथमिकता दी, जिस पर सो कॉल्ड यह सभ्य समाज बात करने को तैयार नहीं है। द मूकनायक की कोशिश रहती है कि हम ग्राउंड पर जाकर, जिसका दर्द है उसे उसी की ज़ुबानी दिखाए। लेकिन संसाधन की कमी के कारण द मूकनायक कई बार उन ख़बरों को नहीं दिखा पाता। यदि द मूकनायक के पास संसाधन हुए तो हम टीम में और भी लोगों को जोड़ेंगे ताकि देशभर से और इसी तरह की ख़बरें आ सकें। साथ ही हमारी टीम कुछ अच्छा कर सकें और पत्रकारिता में क्वालिटी वर्क ला सकें इसके लिए उन्हें फ़ोन, कैमरा, माइक आदि जैसी बेसिक चीजों की ज़रूरत है। हमारी पूरी कोशिश है कि हमारे साथ जुड़े लोगों को एक अच्छी और सम्मानजनक मेहनताना दिया जाए। दूर-दराज की कहानी लाने के लिए उन्हें आने-जाने, रहने और खाने का खर्च वहन किया जाए। अगर हमें मदद मिलती है तो  द मूकनायक की टीम के लिए एक ऑफिस की शुरुआत की जाएगी ताकि वहाँ टीम को एक साथ जोड़ा जाए और उन्हें बारिकियाँ सिखाई जाए। साथ ही हर महीने कुछ और नए लोगों को पत्रकारिता के गुर सीखाए जाएँगे।

हमारी कोशिश है कि हम एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म खड़ा कर दें जहां ना केवल ख़बरें दिखाई जाएँ बल्कि समाज में फैली भेदभाव को उन ख़बरों के द्वारा ख़त्म किया जाए। शासन-प्रशासन को मजबूर कर दिया जाए कि वो उन लोगों की सुने जिन्हें आज तक अनसुना किया गया। हमें आशा है कि आप हमारी इस यात्रा में सहायता करेंगे!

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