Donate And Support To Our Old Age Homes | Milaap
Milaap will not charge any fee on your donation to this campaign.

Donate And Support To Our Old Age Homes

Ask for an update

Story


For English Translation- Please Click Right Mouse Button And Translate It To English   


वृद्धाश्रम के 50 बुजुर्गो के साथ हमने बिताये चंद लम्हे.....
आलेख: संज्ञा टंडन  
बिलासपुर में मसानगंज क्षेत्र में एक वृद्धाश्रम है ‘कल्याण कुंज‘, जहाँ तकरीबन 35 पुरुष और 20 वृद्ध महिलाएँ अपना सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे है। जिंदगी से संतुष्ट, ना कोई इच्छा, न कोई आकांक्षा। कुछ भी ख्.वाइष व्यक्त करने में असमर्थ। नगर के ढेरांे लोग इस आश्रम में पैसों और खाने-पीने का सामान उपलब्ध करवाने में कोई कटौती नहीं करते। हर वृद्ध खुष है, अपनी दिनचर्या में व्यस्त है। उनमें से कई तो अपना घर-परिवार होने के बावजूद यहाँ रहना ज्.यादा पसंद करते है।

डाॅ ़योगेन्द्र परिहार ैम्ब्स् से रिटायर्ड डाॅक्टर हैं,़ जो इन दिनों गनियारी के जन स्वास्थ्य केन्द्र में अपनी सेवायें दे रहे हैं, उनके मार्गदर्षन में हमने कुछ लोगों से बातचीत की और हर महीने के पहले रविवार को इन बुजुर्गो के साथ कुछ समय बिताने का निर्णय लिया। हम 22 लोगों में 14 साल की मीषा और खुषी से लेकर युवा, प्रौढ़ और बुजुर्ग सब षामिल थे। हर सदस्य कलाकार था, कोई रंगकर्मी तो कोई आकाषवाणी से जुड़ा हुआ, कोई गायक और कोई लेखक, इसलिये संवेदना हर मन में थी। (ये जोड़ना है)

ऊपर फरवरी गलत लिखा है
साकेत षुक्ला अपने कराओके के टैªक्स लेकर आया था। रचिता ने माइक व म्यूजिक सिस्टम का इंतजाम कर लिया था। जब हमने वहां अपना परिचय दिया तो उनके चेहरे भाव-विहीन थे। चेहरों को पढ़ने पर लगा जैसे वे सोच रहे हों लोग यूँ ही आते रहते हैं, भजन आदि गाकर चले जाते है, ऐसा ही ये एक और गु्रप आ गया। साकेत ने उनके ज़माने का एक गीत गाया, चेहरों पर रौनक बढ़ी। चंपा भट्टाचार्य, प्राप्ति राय चैधरी, अंतरा चक्रवर्ती सबने सुर मिलाने षुरू किये। अनीष श्रीवास, अविनाष आहूजा, अरूण भांगे, अनुज श्रीवास्तव, मनीष सोनी, तृप्ति राॅय चैधरी, मंजुला जैन, कोहिनूर जेसवानी, नीरज ठाकुर, आभा षुक्ला अंषुल गुलकरी, मयूरी, षीतल सबने बुगुर्गो के बीच बीच में अपनी जगह बनाई और उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़ने की कोषिष षुरू कर दी। कुछ संगीतमय प्रस्तुतियों के बाद उन बुजुर्गो में से 4 लोगों ने खुद अपने ज़माने के गीत गाए। आवाज और गायिकी में दम अभी भी था, ये हमने महसूस किया। वहाँ के निरीक्षक षर्मा जी ने कहा, ऐसा पहली बार हुआ है जब उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्षन किया। अभिलाष का उस दिन जन्मदिन था। सारे बुजुर्गो ने हैप्पी बर्थ डे गीत हमारे साथ गाया और अभिलाष को उन 50 बुजुर्गो से जो आषीर्वाद मिला, उसका तो पूरे साल भर का खजाना भर गया। अभीभूत वे सब भी थे और हम सब भी।


बुजुर्गों के साथ फाग की मस्ती
आलेख: संज्ञा टंडन  
1 फरवरी को वृद्धाश्रम में जाकर बुजुर्गो के साथ बिताया दो घंटे का समय 1 मार्च तक के लिये हम सबको ऊर्जा प्रदान करता रहा। हर दिन उन लम्हों की याद में और अगली बार उनसे मिलने के इंतजार में एक-एक दिन गुजरता चला गया। आखिर 27 दिनों बाद वो पल आ ही गया। हम पहँुचे एक बार फिर उन सबके बीच मार्च के पहले रविवार 1 तारीख की षाम 4 बजे। 5 दिनों बाद होली है, इसलिए आज का कार्यक्रम उनके साथ स्वाभाविक है होली की थीम पर ही आधारित होना था। हमारे आज के कार्यक्रम के एजेंडा में शामिल था....नगाड़ो की थाप, फाग गीतों का जोष, गुजिया की मिठास, हर्बल गुलाल व चंदन का टीका और फूलों की बारिष। ऐसा नहीं है कि महीने के पहले रविवार का इंतजार सिर्फ हमें था, वे भी कर रहे थे हमारा बेसब्री से इंतजार। लेकिन उनमें से कुछ ने ये भी माना कि उन्हें षक था कि हम आयेंगे कि नहीं। औरों की तरह एक बार उनके बीच पहुँचकर, अगली बार आने का वादा करके तोड़ेंगे तो नहीं। दरी-चटाई बिछाकर 4 बजे से पहले ही बैठ गये थे हमारे बुजुर्ग साथी, हमारे इंतजार में। अंतरा गुजियों से भरे डिब्बे लेकर पहुंची, मंजुला हर्बल रंगों के साथ पहुँच गई और फूलों को सुखाकर उनकी पंखुड़ियाँ लेकर अंषुल, अनुज, योगेष भी आ गए। डाॅ ़योगी तो एक वर्कषाप में पिछले 3 दिनों से सिंगरौली गए हुए थे। सुबह 5 बजे से लगातार ड्राइविंग करते हुए सीधे आश्रम आ गए अपने दो साथियों के साथ। सुनील, नम्रता, ऐष्वर्या, स्वप्निल, प्रषांत, अविनाष अपनी बहन के साथ,

1 मार्च
कोहिनूर, आभा, अभिलाष, श्रद्धा...... सब धीरे-धीरे 4.15 बजे तक जमा हो गए। अजय भी आ गया अपने दो फाग गाने वाले साथियों के संग....बस फिर नगाड़े की थाप के साथ फाग-राग षुरू हो गया। वृद्धाश्रम के एक बुजुर्ग अंदर गए और ढेर सारे वाद्ययंत्र मंजीरा, घुघंरू, ढपली और भी न जाने क्या क्या लेकर आकर गए और बराबरी से हमारे साथियों के साथ फाग रंग में ढल कर साथ देने लगे। अंतरा, मंजुला, रचिता ने सबको गुलाल को टीका लगाया, गुजिया खिलाई और आषीर्वाद लिया। सबने मिलकर उन पर फूल बरसाए। हमारे समूह के बच्चे-बच्चियों ने नृत्य करना षुरू किया तो बुजुर्ग महिलाएँ व पुरुष भी उतर आए मैदान में। रंग जमता चला गया, समय कटता चला गया, पता ही न चला दो घंटे का समय कैसे बीत गया। उत्साहित बुजुर्ग, जोष के रंग में रंगे युवा और आस-पास से आ गये कुछ बच्चे फाल्गुनी रंग में कुछ यूं घुल मिल से गये जैसे एक परिवार के सदस्य मिल कर आनंद मना रहे हों।


ुजु्रर्गों के साथ पिकनिक
आलेख - लकी यादव

सुना है जिंन्दगी का असली आनंद सफर करने में आता है। सफर की शुरूआत एक अनसुलझी पहेली की तरह होती है, जो कि सफर के दौरान सुलझती जाती हंै साथ ही दुखी और थका हुआ मन हर पल उत्साह से लबरेज होता जाता है, खुषियों से भरता जाता है। कुछ इसी तरह के सफर का आनंद रविवार 5 अप्रेल को बिलासपुर के कल्याण कुंज वृद्धाश्रम के 40 वृद्धों ने उठाया। इस बार सीनियर सीटिजन को इस दिन मदकूदीप की सैर करवाई जानी थी। शनिवार की रात को ही हमने योजना का प्रारूप तैयार कर लिया था। व्हाट्सएप पर ‘संवेदना’ ग्रुप में सबको समय पर पहुंचने की हिदायत दे दी गई थी। कोई पानी के कंटेनर ले कर आ रहा था, तो कोई बिछाने के लिए चटाई के साथ ही पत्तल व दोने के पहुंच रहा था। आखिरकार आश्रम के समीप हम कुछ लोग दिए गए वक्त से पहले पहुंच गए, क्योंकि हमें पूरी तैयारी जो करनी थी। (काटना है) जितने उत्साहित हम इस सफर को लेकर थे, उससे लाख गुना ज्यादा उत्साहित आश्रम के वृद्ध लोग थे। बुजुर्गों के अनुभव व लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के युवाओं के जोष के संग मनोरंजन के लिए बस में ही अंताक्षरी शुरू की गई। इस दौरान युवाओं ने बुजुर्गो की इच्छाओं के अनुरूप सफर को सुहाना बनाने के लिए भक्ति से ओत-प्रोत  गीत गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया। करीब घंटे भर की यात्रा के बाद सभी मदकूदीप पहुंचे। (गैप या पैरा) बिलासपुर से 44 किमी दूरी पर स्थित यह स्थान छत्तीसगढ़ के पर्यटन स्थलों में से एक है जो कि षिवनाथ नदी के शांत जल से घिरा एक द्वीप है। हर साल फरवरी माह में होने वाले ईसाई मेले के कारण से यह स्थान प्रसिद्ध है। पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन के दौरान यहां कृष्ण, उमा व गणेष की प्राचीन मूर्तियां पाई गईं, साथ ही खुदाई के दौरान प्राचीन काल के 19 षिव मंदिरों का पता चला। इस द्वीप का नाम मदकू ऋषि के नाम पर रखा गया है।
गर्मी इतनी थी कि हमने देरी ना करते हुए बुजुर्गों को लीची के जूस, तरबूज व ककड़ी बांटी।(जोड़ना है) हमने बातों ही बातों में बुजुर्गो का मनोरंजन करना प्रारंभ किया। इस मनोरंजन के दौर को आगे बढ़ाने के लिए सभी को गोल बिठाया गया. और ‘इसकी टोपी

5 अप्रेल    
उसके सर’ खेल शुरू किया गया। जिसमें सभी बुजुर्गों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। साथ लाए गए ढोल-मंजीरे के सहारे बजती धुनों के साथ ही टोपी एक सर से दूसरे सिर पर घूमती। जहां संगीत रूकता उस समय टोपी जिसके सर पर रहती वह अपनी इच्छानुसार भजन, चुटकुले, व संगीत गाकर खेल को आगे बढ़ाता। जहां कुछ बुजुर्गों ने उत्साह पूर्वक इस खेल में भाग लिया, तो वहीं कुछ शरमाए, तो कुछ हिचकिचाएं, लेकिन धीरे-धीरे सभी ने एक-एक कर खेल का जमकर आनंद उठाया। इसके बाद हमारे साथियों ने सामूहिक गीतों की महफिल जमानी शुरू कर दी। ये सुन-देख कर वृद्ध लोग और भी उत्साहित हो गए। एक पल तो ऐसा आया जब गाना सुनकर एक वृद्ध महिला के पैर थिरक पडे़।
इसके बाद सभी को स्वादिष्ट भोजन कराया गया। धूप की तपिष जब थोड़ी कम हुई, सब मदकूद्वीप के मनोरम सौंदर्य को देखने निकल पड़े. कोई नदी के किनारे चल पड़ा, तो कोई मंदिरों में पूजा पाठ करने में लग गया। कुछ की रुचि खुदाई मंे निकले षिव मंदिरों में थी। संध्या हो चली थी और हमारे सफर का अंत होने का समय भी आ गया। हमारी बस वापस अपने आषियाने की ओर रवाना हुई. सभी ने सफर के हर पल का मजा लिया. आश्रम पहुंचते ही उन सभी वृद्धों को जो लोग इस सफर में नहीं जा पाये थे, बाकी लोग उत्साह पूर्वक अपने सफर के अनुभव बताने लगे। इस मौके पर लिब्रा वेलफेयर सोसाइटी के लोगों ने बुजुर्गों का भरपूर साथ दिया और उनके सफर को एक अद्भुत अनुभव का पात्र बनाया। और बस हम सबकी यादों में एक और महत्वपूर्ण दिन अंकित हो गया।  


अक्षय तृतीया का अवसर और शादी गुड्डे गुड़ियों की
आलेख: मीनू सिंह  

3 मई को खास दिन था जिसकी तैयारी लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के सदस्य बड़े जोर शोर से कर रहे थे क्योंकि इस दिन छोटे बच्चों के साथ मिलकर गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाया जाना था और जगह थी वृद्धाश्रम। कल्याण कुंज वृद्धाश्रम के निचले भाग में बुजुर्ग पुरुष और ऊपरी हिस्से में महिलायें हैं। अक्सर हमने देखा है कि महिलायें मुखर हुआ करती हैं, पर पुरुष चुपचाप से रहते हैं। जब बारातियों के स्वागत की तैयारी करके आश्रम पहुंचे तो मन उत्साह से भर गया क्योंकि वहां बुजुर्गों ने विवाह की बहुत सारी तैयारी करके रखी हुई थी। गुड्डे गुड़ियों के छोटे छोटे पीढ़े 50-50 रु. में एक दिन पहले ही मंगाये जा चुके थे, उन्हें रंगा जा चुका था। गुड़िया के जेवर, कपड़े, पीले चावल, परछन का सामान, सब तैयार था। अरुण, अनुज, प्रषांत, रुनझुन ने मंडप सजाया। इसी बीच अभिषेक की ढोलक और अंतरा के गीत नृत्य ने बिलकुल शादी का माहौल तैयार कर दिया। बुजुर्ग महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ बन्ना बन्नी गीत गाये। तब तक काॅलोनी और अरुण के घर से आये बच्चों ने ढेर सारे बच्चे इकट्ठे कर लिये थे। सबने मिलकर निकाली बारात। प्रषांत, अनुज, अभिषेक के गीत और अजय की ढोल पर थाप, बच्चे तो बच्चे आश्रम के बुजुर्ग भी मगन होकर नृत्य करने लगे। उनमें से कई लोगों ने बचपन में हर साल अक्ती यानि अक्षय तृतीया पर इस तरह के आयोजनों में हिस्सेदारी के किस्से भी हमें सुनाये। इस बार रुनझुन की दादी भी हमारे साथ थीं जो लगातार हमारा मार्गदर्शन कर रही थीं।

3 मई
बारात जब आजाद नगर की गली से निकली तो इतनी शानदार थी कि काॅलोनी वासी छतों पर आ गये, सड़क चलते लोग रुककर आनंद लेने लगे और घराती बने हमारे साथी भी नाचने में शामिल हो गये बारात में। नाचते गाते बाराती जब लौटे तो रुनझुन, अंतरा, प्रमिला और मैंने द्वार-चार किया। बुजुर्ग महिलाओं ने परंपरागत गाली गाई। मजा तो तब आया जब प्रषांत ने द्वार-चार के समय द्वार पर धरना दे दिया कि हमारा दूल्हा तो तभी अंदर आयेगा जब उसको कार मिलेगी। उसे दहेज लेने के जुर्म में पुलिस को बुलाने की धमकी दी गई तब वो माना और अंदर आया। मज़ाक-मज़ाक में ही सही दहेज न लेने-देने की बातें भी वहां संकेतात्मक रूप में की गईं। फिर दूल्हे दुल्हन के फेरे हुए, उस समय भी नोंक-झोंक वाले गीतों का सिलसिला जारी रहा। बारातियों को छत्तीसगढ़ी व्यंजन फरा, गुलगुला के साथ चटनी, बरफी, पोहा आदि का नाश्ता  करवाया गया। ये एक ऐसा अवसर था जिसमें वृद्धाश्रम के सभी सदस्यों ने भाग लिया। अक्सर वो चेहरे जो नवांगतुकों से ही नहीं अपने साथियों से भी बातचीत करने में असहज हो जाते थे, आज खिले हुए थे। घरों में मनाये जाने वाले त्योहार यहां भी इतने उत्साह से मनायेंगे, ये वो सोच भी नहीं सकते थे। बचपन एक बार फिर हमने आज यहां जिया है, जब ऐसा एक बुजुर्ग ने हमसे कहा तो लगा कि हमारा प्रयास सफल हुआ। उन्होंने कहा हमें अगले कार्यक्रम का इंतजार रहेगा। ये इंतजार हमें भी रहेगा। (रिपीट टाइप)


वृद्धाश्रम में नाटकमय हुआ माहौल
आलेखः संज्ञा टंडन
लिब्रा वेलफेयर सोसायटी का एक प्रयास, कल्याण वृद्धाश्रम में रहने वाले तकरीबन 70 महिला पुरुष बुजुर्गों के साथ महीने में एक दिन दो घंटे का समय व्यतीत करना, उनकी समस्याओं को समझना, उनके दिल को छोटी छोटी खुशियाँ देना। फरवरी के महीने से ये सिलसिला शुरू हुआ था। 4 बार उनसे मिलने के अलावा बीच बीच में भी हम उनकी समस्याओं के समाधान के लिये उनके पास जाते रहे। लेकिन अब वे बुजुर्ग भी पहले रविवार का इंतजार करने लग गये हैं हमसे मिलने के लिये। जून के पहले रविवार को भी शाम 4 बजे पहुँच गई हमारी फौज। आज इस फौज में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय के चंद नये चेहरे भी मौजूद थे। दो दिन पहले ही 5 जून को पर्यावरण दिवस गुज़रा था जिसमें इन नये चेहरों ने अनुज के निर्देशन में नगर में एक नुक्कड़ नाटक किया था और उसके पहले सुनील के निर्देशन मे अग्रज नाट्य दल की टीम पुणे में अपने नाटक ‘खबसूरत बहू’ का नाट्य प्रदर्शन करके लौटी थी। सभी उस रंग में रंगे थे। सुनील ने आज बुजुर्गों की नाट्य-कक्षा ले ली। कुछ पुराने नाट्य गीतों जैसे ‘एक थाल मोतियों से भरा, सबके सिर पर औंधा पड़ा’, ‘मैं हूं मोती नाला’ आदि को ग्रुप के लोगों ने सामूहिक रूप से गाया और बुजुर्गों को सिखाया। वाह...उनको भी बहुत मजा आया।

7 जून
एक बुजुर्ग ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती’। एक महिला का कहना था ‘इतनी उम्र में भी हमने ऐसा अनुभव आज तक नहीं पाया’।इस दौरान हमारी महिला साथियों का काम एक कोने में चुपचाप चल रहा था। वे प्याज, टमाटर, मिर्च आदि काटने में मषगूल थीं। एक तरफ दोने रखे थे और मिक्षचर, मुरमुरा, चना, मूंगफली, कुछ चटनियां आदि सामान इनके चारों ओर रखा हुआ था। कुल मिलाकर भेल बनाने का कार्यक्रम चल रहा था।
हमने सब बुजुर्गो की जन्मतिथियां जाननी चाहीं तो किसी को पता नहीं थीं और किसी को याद नहीं थीें तो इस महीने से हमने एक काम और शुरू किया। हर महीने एक केक लाकर एक महिला व एक पुरुष बाबा-दादी के साथ उस महीने हमारे ग्रुप के जिस सदस्य का जन्मदिन उस महीने में होगा उसके साथ उनको केक कटवाने का काम। दूसरे ही दिन मेरा जन्मदिन था...मेरे लिये सरप्राइज था ये....दो बुजुर्गों के साथ मैंने केक काटा, सबने गाना गाया, केक खाया। बड़ों से आशीर्वाद लिया, छोटों को दिया।
ड्रामा ट्रेनिंग खत्म होने तक भेल वितरण शुरू हो गया और अनुज के निर्देशन में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय के छात्रों ने पर्यावरण नाटिका का प्रदर्शन वहीं पर आरंभ हो गया। भेल के साथ साथ नाटक का आनंद। बुजुर्गों के साथ हम सबको भी मिला आनंद, साथ ही हम पर बरसा ढेर सारे बाबा दादियों का एक बार फिर से आशीष। एक महीने के लिये ऊर्जा एकत्र करके, उनसे अगले महीने फिर से आने का वादा करके, हम सबने वहां से विदाई ली।


पिछले 6 महीनों का सफर
आलेखः संज्ञा टंडन
फरवरी से जुलाई तक का सफर......हर महीने का पहला रविवार....बुजुर्गवारों का साथ.... इंतजार बार-बार....आज हम फिर हैं उनके साथ.....हमारा उनसे बढ़ता लगाव....उनका हमसे बढ़ता प्यार लगातार....अपरंपार.....
पिछले पाँच महिनों में हमने इन बुजुर्गों को पिकनिक ले जाकर घुमाया उनके साथ अक्षय तृतीया पर गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचाया, होली के अवसर पर नगाड़ों के साथ फाग-उत्सव मनाया, नाटक दिखाया, उनसे गाने गवाए, खेल खिलवाए....और आज इन सब अवसरों पर खींची गई तस्वीरों का प्रोजेक्टर पर उनके साथ प्रदर्षन किया जाने वाला है।
हम 4 बजे वहाँ पहुँचे, उसके पहले दरी बिछाकर सब तैयार होकर हमारे इंतजार में बैठे हुए मिले। अब तो वे हमें छेड़ने भी लगे हैं।
‘कइसे नोनी आज बड़े उदास दिखत हस‘
‘का बात हे आज का कराबो हमन ला‘
‘अब एक महिना के इंतजार नई होवत हे बाबू, थोड़किन जल्दी जल्दी आये करव ना‘
उनकी ऐसी बातों से हमारा जोष और बढ़ जाता है।
प्रोजेक्टर लगने की प्रक्रिया के दौरान केक काटने का कार्यक्रम किया गया। एक बाबा, एक दादी जिनको अपने जन्मदिवस की तिथि नहीं मालूम है, उनको बुलाकर हमने उनसे केक कटवाया उनका जन्मदिन गीत गाया और सबको केक बँाटना शुरु किया हमारी बच्चियों मीषा और खुषी ने।
उनकी जिज्ञासा प्रोजेक्टर देखकर हो रही थी कि ‘सिनेमा दिखाबो का’ तो हमने कहा इंतजार करिये आज के हीरो हीरोइन आप ही लोग हैं। फिर सिनेमा शुरु हुआ। अपनी और साथियों की तस्वीरों को देखकर वे बहुत खुष थे और उनके चेहरों कि बदलती रंगत को देखकर हम। एक-एक फोटो पर उनके कमेंट्स हमारे ग्रुप के साथ उनकी और नजदीकी बढ़ा रहे थे।


3 जुलाई
इतनी देर में पहले से निर्धारित किया हुआ एक चाट का ठेला आश्रम के कैंपस में लगवा दिया गया। (जोड़ना है) फोटो प्रदर्षन सेषन के बाद चाट-गुपचुप खाने के लिए सबको आमंत्रित किया गया। पहले तो वे हिचकिचाते-शर्माते रहे। किसी ने कहा, ‘हमारे दांत नहीं हैं, कैसे खाएँ’ किसी ने कहा, ‘मन तो बहुत है, पर पेट न खराब हो जाये’। हमने बताया बिना मिर्च का अच्छे पानी का इस्तेमाल करके आप लोगों के हिसाब से सब तैयार करवाया गया है। कुछ लोगों ने शुरु किया फिर तो लाइन लग गई।
‘बरसों बाद चाट का स्वाद लिया बिटिया, तुम सब के कारण मजा आ गया’
‘हम तो यहां जब से आये हैं पहली बार चाट खाने को मिली’
‘सब लड्डू-पूड़ी-मिठाई दे जाते हैं यहाँ, तुम लोग बहुत अच्छा सोचते हो’
क्या ऐसी बातें हमको खुष करने के लिये और हमारे उद्देष्य को पूरा करने के लिए काफी नहीं थीं। छोटी-छोटी सी खुषियां और उनसे बड़े-बड़े से आषीर्वाद, संवेदना कार्यक्रम का यही है प्रयास जो चलता रहेगा लगातार।

फ्रेंडषिप डे का मनाना और नेत्रदान की प्रेरणा
आलेख: अरुण भांगे
हर महीने की तरह इस महीने यानि अगस्त के पहले रविवार भी हम पहुँच गये कल्याण कुंज, अपने बुजुर्ग साथियों के बीच। क्योंकि ये अगस्त का पहला रविवार था, जो पूरी दुनिया में फ्रेंडषिप डे (मित्रता दिवस) के रूप में मनाया जाता है, तो हम सब ने भी तय किया कि इस बार हम अपने बुजुर्ग साथियों के साथ ‘फ्रेंडषिप डे’ मनायेंगे और कोषिष करेंगे उनसे दोस्ती कर, उनके और करीब जाने की। तो बस हम पहुँच गये अपने हर बार के निर्धारित समय ठीक 4 बजे अपने बुजुर्ग साथियों के पास उन्हें अपना दोस्त बनाने के लिये।
‘फ्रेंडषिप डे’ की परंपरा है कि दोस्त एक-दूसरे की कलाई पर फ्रेंडषिप बैंड बांधते हैं, जो हम भी लेकर गए थे। पर कोई आम बाजार से खरीदे हुए नहीं, खास फेंडषिप बैंड जो अंतरा ने अपनी बेटियों खुषी और रिमझिम के साथ मिलकर घर पर ही बनाए थे। चटक लाल, पीले रंग के रक्षा सूत्र (मौली धागे) पर चिपका हुआ कागज़ का टुकड़ा, जिस पर दो चमकीली रंगीन बिंदियों के साथ लिखा था ‘‘हम आपके साथ हैं’’। सचमुच बड़े स्नेह और धैर्य  के साथ इतने सारे बैंड बनाए थे इन तीनों ने, जो बड़े ही सुंदर और आकर्षक लग रहे थे। इनमें शामिल था बुजुर्गों के प्रति हमारा स्नेह, सम्मान और अपनापन।
फिर हमने बुजुर्ग साथियों को बताया कि हम आज फ्रेंडषिप डे यानि मित्रता दिवस सेलिब्रेट करेंगे, तो कुछ की तो समझ में ही नहीं आया कि ये होता क्या है। तो हमने पहले हमने उनको फ्रेंडषिप डे के बारे बताया कि ये होता है ‘मितान दिवस’ और सभी दादा, दादियों से कहा कि आप लोग आपस में अपने अपने मित्रों और सहेलियों को फ्रेंडषिप बैंड बांधिये। सब बहुत खुष हो गये और खुषी-खुषी एक दूसरे की कलाइयों में बैंड बांधने लगे। किसी की कलाई में 2-3 बैंड बंध गये थे, तो किसी की कलाई अभी भी सूनी थी, किसी का बैंड जेब के हवाले हो गया था तो किसी का रूमाल में छिपाकर रख लिया गया था, पूछने पर पता चला कि उनके साथी घूमने गये हैं या वहां उपस्थित नहीं हैं। पर जिनकी कलाइयों सूनी रह गई थीं वे कुछ मायूस भी दिखे। हम उनको ऐसा कैसे देख सकते थे, हम तो उनके साथ खुषियां बांटने जाते हैं। फिर हम षुरू हो गये, जिनकी कलाइयों सूनी थीं उनके पास पहुंच गये उनसे  दोस्ती करने। हमने उन्हें फ्रेंडषिप बैंड बांधा और उन्हें अपना दोस्त बना लिया। बदले में उन्होंने भी हमें बैंड बांधा, पक्की दोस्ती का वादा किया और खूब सारा आषीर्वाद भी दिया।

2 अगस्त
इस सबके बीच हमारे नये-नये बने दोस्तों में से कुछ दोस्त भावुक भी हो गये। वो अपने बचपन के, स्कूल-काॅलेज के, आॅफिस के और गली-मोहल्ले के दोस्तों को याद कर रहे थे। तभी हमारे बीच एक नन्हा साथी भी बुजुर्गों से मिलने आया, अविनाष का पुत्र ‘आदि‘ और भतीजी ‘अंषु‘ और साथ ही आयी थीं ‘आदि‘ की ‘दादी‘। नन्हें ‘आदि’ से मिल कर दादा-दादियों की तो खुषी का ठिकाना नहीं रहा। सब बहुत खुष हो गये। दादियां तो ‘आदि’ को अपना ‘पोता-दोस्त‘ बनाने की होड़ में लग गईं। कोई उसको फ्रेंडषिप बैंड बांध रही थी, कोई दुलार कर रही थी तो कोई अपनी गोद में उसे लेने को आतुर थी तो कोई उसको देखकर भावुक थी। कुछ तो हमारे मना करने पर भी अपने पल्लू में बंधा आषीर्वाद ‘आदि’ को दे रही थीं। ‘आदि’ को सभी दादा-दादियों से बहुत लाड़-प्यार-दुलार-आषीर्वाद मिला।
इधर माहौल बदल रहा था। सुनील जी, अनीष जी, रचिता, अनुज, अविनाष, स्वप्निल और अरुण के बीच कुछ खिचड़ी पक रही थी, कुछ कानाफूसी हो रही थी। क्या कुछ गड़बड़ हो गई थी या होने वाली थी। नहीं जी नहीं कोई गड़बड़ नहीं थी। ये सब तो तैयार कर रहे थे नाटक दिखाने की। सबने मिलकर ‘नेत्रदान‘ पर तीन लघुनाटिकाओं की प्रस्तुति दी और साथ ही साथ सुनील जी और संज्ञा जी ने नेत्रदान व देहदान से संबंधित जानकारियां भी बड़े सहज ढंग से उनको दीं। दादा-दादियों ने प्रस्तुति को खूब सराहा और साथ ही साथ नेत्रदान का संकल्प भी लिया। हमने वहां उनको ये जानकारी भी दी कि लिब्रा वेलफेयर सोसायटी के पूर्व अध्यक्ष डाॅ.रमेषचंद्र महरोत्रा ने सपत्नीक षरीरदान की घोषणा की थी और उनके घर के सदस्यों ने उनकी मृत्युपरोपरांत उनकी ये इच्छा पूरी भी की। यहां रहने वाले एक दादाजी ने बताया कि उन्हांेने भी अपना षरीर स्थानीय मेडिकल काॅलेज में दान किया हुआ है। इससे प्रेरित होकर और भी दादा दादी लोग नेत्रदान व देहदान के लिये आगे आने लगे।
इधर हमारी गतिविधियों के बीच बाहर कुछ चटपटी, कुछ स्वादिष्ट सी खुषबू बिखर रही थी। अरे वाह! बाहर आंगन में तो दाबेली की गुमटी लग गई थी। अब बारी थी थोड़ी पेट पूजा की। इस बार पेट पूजा के लिये चटपटी दाबेली का इंतजाम था। सबने खूब मजे लिये दाबेली के, खूब चटखारे लगाये। सबकी अपनी-अपनी पसंद थी किसी को थोड़ा मीठा चाहिये था, किसी को बिना मीठे का, किसी को तीखा तो किसी को चटपटा।
दाबेली का स्वाद लेते हुए हमने अपने नये-नये बने मित्रों से बात करने की कोषिष की। वैसे तो कोषिष हर बार करते हैं, पर पता नहीं इस बार फ्रेंडषिप डे पर हुई दोस्ती का कमाल था या हर महीने की हमारी उपस्थिति से बने विष्वास का......ऐसा लगा कि उनके पास जाने और उनके सुख दुख बांटने का हमारा ये प्रयास ‘संवेदना‘ सफल हो रहा है क्योंकि वे अब हमारे साथ अपने सुख-दुख की बातें भी शेयर करना शुरू कर चुके थे।


आलेख: रचिता टंडन
जिज्ञासा, अचम्भे और उत्साह से लबरेज़ बाबा-दादियों के साथ बीते पल
सिंतबर का महीना शुरू हो चुका था, किसी को इंतजार था बारिष का, तो किसी को गरम गरम भुट्टों का, कहीं षिक्षक दिवस और गणेषोत्सव की तैयारी चल रही थी तो कहीं आने वाली परीक्षाओं की, पर हमें तो बस इंतजार था पहले रविवार का। यूं तो ये इंतज़ार हर बार रहता है, पर इस बार कुछ ज़्यादा ही था क्योंकि इस बार हमारा प्रोग्राम भी तो बहुत ख़ास था। इस बार हम सारे बाबा-दादियों को पिक्चर दिखाने जो ले जा रहे थे। शो का समय था 10 से 1 बजे का और हमारे बाबा दादी लोग इतने उत्साहित थे कि वे सुबह 7 बजे से ही नहा-धोकर, नये कपड़े पहनकर हमारा इंतजार कर रहे थे। हम अपनी आदत से मजबूर फिर थोड़ी देर से पहुंचे, पर इस बार हमें डांट भी पड़ी.....पर इस डांट में अपनेपन की खुषबू थी.....हमने उन्हें थोड़ा बहलाया, फिर फुसलाया, फिर मनाया और फिर उन्हें लेकर हमारी तकरीबन 12 गाड़ियों का काफिला निकल पड़ा रामा मैग्नेटो माॅल की तरफ। अविनाष और हैंड्स ग्रुप के उसके साथियों ने समय से सबको माॅल पहुँचा दिया। वहां माॅल के कर्मचारियों के साथ हमारे ग्रुप के बहुत सारे मेम्बर्स दादा-दादियों के स्वागत के लिये पहले से पहुँचे हुए थे। सभी ने एक एक दादा-दादी का हाथ थामा और ले चले उनको पीवीआर की तरफ। माहौल कुछ ऐसा था कि दादा दादी अचंभित इतनी बड़ी बिल्डिंग देखकर...कई सवाल उनके जेहन में....और उनके जवाब हमारी ज़बानों पर...पूरा माॅल घूमते हुए जब हम उन्हें लेकर पीवीआर पहुंचे तो फिल्म शुरू होने में कुछ ही समय बचा था....पहुँच गये हाॅल के अंदर....सारे दादा दादी अपनी पसंद और सुविधानुसार जगह पर बैठ गये....पिक्चर थी ‘मांझी’...शुरू में मेरे बगल में बैठी एक दादी बोलती हैं ‘हाय राम इतना बड़ा टीवी‘ तो दूसरी दादी बोलती हैं ‘मुझे पूरे 35 साल हो गये हाॅल में पिक्चर देखे हुए।’ जैसे जैसे पिक्चर बढ़ती गई, सभी के हाव-भाव बदलते रहे। कुछ हंसे, कुछ रोये, कुछ गुस्साये तो कुछ सिर्फ मुस्कुराये। इंटरवेल हुआ...तो याद आई पाॅपकाॅर्न की, (काॅमा लगाना है) हम भी गये भागते हुए उनकी इच्छा पूरी करने। (पूर्ण विराम लगाना है) ‘वाह! मज़ा आ गया‘...बस यही तो सुनना था हमें...और यकीन मानिये उस दिन सभी ने यही कहा। पिक्चर फिर शुरू हुई और हमारे सारे बाबा-दादी फिर खो गए उसमें। अब आप सोच रहे होंगे पिक्चर खत्म...किस्सा खत्म....पर पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त...यकीनन पिक्चर ज़रूर खत्म हुई पर किस्सा नहीं।
रामा मैग्नेटो वालों ने सभी के लिये लंच का इंतज़ाम कर रखा था। तो जैसे ही हम हाॅल से निकले, सीधे फूड कोर्ट पहुंचे। पूरा फूड कोर्ट महक रहा था गज़ब की सुगंध से। सामने टेबल पर गरम-गरम पनीर और आलू गोभी की सब्जी, दाल, नान, सलाद, चावल, रायता और ढेर सारे गुलाब जामुन रखे थे....देखते ही हमारे मुंह में भी पानी आ गया।

6 सिंतबर
दादा-दादियों को बिठाया और हम सब खुद लग गये उनको परोसने और खिलाने में। माॅल के रसोइयों ने अधिकारियों के निर्देष पर कम मसाले और कम मिर्च का खाना बनाया था बाबा-दादियों की सेहत का ख्याल रखकर.....और सभी ने बहुत स्वाद ले लेकर भरपेट खाया और ढेर सारा आषीर्वाद भी दिया।
अब बारी थी वापस जाने की.....तो कहते हैं ना बुढ़ापे में बचपन लौट आता है...वैसा ही हुआ...कुछ ने कहा हमें अभी नहीं जाना....तो कुछ ने कहा हमें अभी और घूमना है...हमारे साथियों ने फिर एक बार बागडोर संभाली और ले गये उन सबको अलग अलग ग्रुप में माॅल घुमाने.....माॅल घूमते वक्त उनके जिज्ञासा भरे प्रष्न और उन सबके चेहरों के बदलते हाव भाव....उफ़़्.... हमारे लिये भी कभी न भूलने वाले पल थे.....आधे घंटे बाद सभी एक जगह इकट्ठे हुए तो देखा अविनाष और उसके दोस्त फिर तैयार थे अपनी-अपनी गाड़ियां लेकर...सभी बाबा-दादियों को बिठाया और सुरक्षित उन्हें वापस वृद्धाश्रम छोड़ दिया....सभी खुष थे, सभी कह रहे थे ...‘बहुत दिनों बाद इतना आनंद आया‘ और पूछ रहे थे....‘फिर कब? हम भी अगले महीने आने का वादा कर वहां से विदा हुए।
लेकिन अगला महीना शुरू हो उससे पहले (गैप) ही आ गया गणेषोत्सव।  वृद्धाश्रम से हम सबके पास व्यक्तिगत रूप से फोन आए उनके गणषोत्सव में एक दिन शामिल होने के लिये। उनकी दिली इच्छा का ध्याान रखते हुए उस दौरान हम सब एक बार फिर उनके आश्रम पहुंचे और एक शाम फिर उनके साथ बिताई पूजा अर्चना में शामिल होकर।
(यहां वाली फोटो सामने वाले पेज पर और यहां पर फिल्म देखते या माॅल में घूमते हुए वाली फोटो लग जाती तो अच्छा होता)


त्योहारों में अपनों को याद करने का सिलसिला
आलेख: रचिता टंडन
वृद्धाश्रम जाते ये नवां महीना है हमारा और हमारी उपलब्धि ये कि हम उनके दिल में धीरे धीरे बसने लगे हैं....वो हमें अब अपना मानने लगे हैं.....उन्हें हमारा भी उतना ही इंतजार रहता है जितना कि हमें।
जैसा कि हमने उनसे वादा किया था, हम पहुँच गये ठीक 4 बजे। कल्याण कुंज में पहले से दरियां बिछी हुई थीं....अंदर से प्रमिला दीदी की आवाज़ आ रही थी....जल्दी तैयारी करो, सब आने वाले होंगे.....हम सब मुस्कुरा पड़े।
ख़ैर हमें आते देख सभी की आंखें हमसे पूछ रही थीं, इस बार क्या? हमने भी ज़्यादा देर तक सरप्राइज़ नहीं बनाया....और उनसे कहा, ‘‘बाबा-दादी, त्योहारों का समय चल रहा है....एक के बाद एक त्योहार...ऐसे में हर किसी को अपनों की याद तो आती है....इच्छा होती है कि अपने घर में, दोस्तों से, रिष्तेदारों से बात करें...माध्यम होंगे हम....हम सबने अपने-अपने मोबाइल निकाल कर रख दिये।
उसके बाद जो सभी बाबा दादियों की प्रतिक्रियाएं थीं, वो हैरान करने वाली थीं। कुछ तो बहुत खुष हुए और भागते हुए अपने बिस्तर से फोन डायरियाँ या कागज़ की पर्चियाँ जिन पर नंबर लिखे थे...और लग गये फोन लगवाने में हमसे....और काफी बातें भी कीं। कुछ ने कहा हमारा तो कोई है ही नहीं...हम तो अकेले हैं...तो कुछ ने कहा हमारे पास नंबर ही नहीं हैं...कुछ गुस्सा हुए और कहने लगे, जिन्होंने हमें घर से निकाल दिया, उन्हें त्योहार की बधाई क्यों दें...बात करनी ही होती, तो हमें यहां क्यों छोड़ते? एक दादाजी बोलते हैं, तुम बच्चों को देखता हूं तो नाती-पोतों की याद नहीं आती, अब तो तुम्हीं सब हमारा परिवार हो......

4 अक्टूबर
उस दिन कई आंखें नम हुईं, कुछ की खुषी से-जिनकी घरों में बात हुई, कुछ की दुख में-जिनको अपनों की याद तो आई, पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई, कुछ उनकी-जिनके अपने कोई थे ही नहीं और कुछ हमारी-उनकी आपबीती सुनकर। बहुत मिला जुला सा माहौल था। आपस में भी बातें उनकी अपनों और न रहे अपनों को लेकर ही हो रही थी।
माहौल को ठीक करने की जिम्मेदारी उठाई हमारे साकेत ने....माइक उठाया और शुरू हो गया...एक से बढ़कर एक बेहतरीन नगमें गाए उसने और माहौल को खुषनुमा कर दिया। हमारे दादा दादी जो कुछ पल पहले तक अपने आंसू छुपा रहे थे...वहीं अब खुद माइक लेकर गाने लगे थे।
सच ही कहते हैं...संगीत में जादू होता है, जो हर गम को खत्म कर देता है। इतने में एंट्री ली हमारी आभा दीदी ने....बहुत बड़े बड़े कपड़े के थैले लेकर...देखा तो उसमें थे  बड़े-कचैड़ी-समोसे और मिठाई....प्रमिला दीदी की चाय भी बन गई थी....और शुरू हो गई हल्की सी बारिष...
बस बारिष....नग़मे....गाने...समोसे, बड़े और साथ में चाय.....और क्या चाहिये एक शानदार शाम के लिये....गप्पें! जी वो तो करने में हम एक्सपर्ट हैं ही.....

नवंबर यानि दीवाली
आलेख: रचिता टंडन
दीवाली का नाम सुनते ही ज़ेहन में आती है ढेर सारी खुषियां, अपनों के साथ हंसी-मज़ाक, दादी-नानियों के किचन से आती पकवानों की खुषबू, आंगन सजाती रंगोली, चैखट पर नया तोरण, दियों की लंबी कतारें, आतिषबाज़ी और लक्ष्मी मैया की पूजा और ढेर सारे उपहार.....
(4 जगह काॅमे)
हमने इस बार सोच लिया कि इस बार महीने का पहला रविवार दीवाली का त्योहार कल्याण कुंज आश्रम में मनायेंगे। खुषियां बांटने से बढ़ती हैं...तो अपनी खुषियां बांटने हम पहुंच गये अपनों के बीच...
कुछ दिन पहले जब हमारे कुछ साथी आश्रम गये थे बाबा-दादियों से मिलने, तो उन्हें पता चला था कि कुछ बाबा-दादियों की तबियत सही नहीं है...तो हमने सोचा कि क्यों न इस बार दीवाली के उपहार स्वरूप हम उन्हें दें अच्छी सेहत का तोहफा। इस उपहार को साकार करने के लिये हम मिले डाॅ.अंषुमन जैन से जो होम्योपैथी डाॅक्टर हैं. डाॅक्टर साहब भी लग गये उनके मर्ज़ को पकड़ने और उन्हें दवाइयां देने में...
इसी बीच हमारे बाकी साथी भी आ पहुंचे अलग अलग साकमान लेकर.....रंगोली.....पकवान बनाने के लिये आटा, मैदा......फूलों की माला.....दीया-बाती-तेल.....पटाखे.....मिक्षचर....अचार....चकला-बेलन....और इन सबके आने के बाद तो जैसे आश्रम का माहौल ही बदल गया। इस बार हम हर बार की तरह एक जगह नहीं बल्कि अलग अलग ग्रुप में बंट कर काम कर रहे थे।
नज़ारा ऐसा था कि...लड़कियों का एक ग्रुप दादियों के साथ रंगोली सजा रहा था.....अगल बगल बैठे दादाजी लोग ठहाके लगा रहे थे....बच्चों ने मोर्चा संभाला आश्रम को सजाने का...जगह जगह अपनी कलाकारी कर रहे थे.....अंदर एक कमरे में डाॅक्टर साहब बाबा-दादियों की सेहत ठीक कर रहे थे.....तो हमारे लड़के पूजा घर सजा रहे थे......अंदर बड़े हाॅल में भाभियों और दीदियों ने दादियों के साथ मिलकर कमान संभाली पकवान बनाने की....और देखते ही देखते पूरा आश्रम महक उठा स्वादिष्ट पकवानों की खुषबू से.....
इतने में एक दादाजी ने अपना जादुई पिटारा खोला और उसमें से निकला ढोलक और मंजीरा...बस फिर क्या था....एक के बाद देवी भजन....षिरडी वाले साईं बाबा, दमादम मस्त कलंदर, भर दो झेाली मेरी या मोहम्मद, चलो बुलावा आया है...ऐसे गीतों से पूरा आश्रम गूंजने लगा....


1 नवंबर
समय हो गया था पूजा का। आरती की थाल सज चुकी थी...प्रसाद दिये सब चीजें तैयार थीं...पूजा के बाद समय था दिये जलाने का, हमारे साथियों ने पूरे आश्रम को दियों से सजा दिया...पूरा आश्रम दियों की जगमगाहट से चमकने लगा...उधर पकवान भी तैयार थे...सबने भर पेट गरम गरम खस्ते, भजिये, रसगुल्ले और नमकीन खाया। अब बारी थी पटाखों की...सभी आ गये आंगन में...और सिलसिला शुरू हुआ आतिषबाजी का.....हर बाबा दादी मगन थे अपनी अपनी फुलझड़ी जलाने में, कोई कागज जलाकर कहता इससे अनार जलाते हैं तो कोई फुलझड़ी खत्म होने से पहले अपनी चकरी जलाने की जद्दोजहद में लगा था। कोई दादी फुलझड़ी जलाकर दीवाली की बधाइयां दे रही थीं...तो कोई बाबाजी दूसरे बाबाजी को संभल कर पटाखे जलाने की हिदायत दे रहे थे....पूरा आश्रम हंसी और ठहाकों से मुस्कुरा रहा था.....और सोच रहा था....ये पल यहीं थम जाये..‘‘ऐसा उत्स्व और माहौल आश्रम में आज तक नहीं हुआ‘‘ बाबाजी के ये लफज थे...ढेर सारा प्यार, आषीर्वाद और खुषियां लेकर हम विदा हुए.....


बस एक मिनट और बुजुर्गों का स्वास्थ्य
रचिता टंडन
इस बार जब हम वृद्धाश्रम पहुंचे तो बहुत सारी तैयारियों के साथ पहंुचे। हमने तैयार किये थे ढेर सारे एक मिनट वाले खेल। पहुंचते ही बाहर आंगन में हमने जमाई बैठक, लगाई बीच में एक टेबल और शुरू कर दिया खेलों का सिलसिला। हमने बनाये छोटे छोटे बाबा-दादियों केे ग्रुप और फिर खिलाये उनको खेल।
पहला खेल था बोतल में धागे से लटकी चूड़ी पहनाने का खेल, फिर चावल में से मटर अलग करना, स्ट्राॅ से थर्मोकोल बाॅल्स उठाना, फूले हुए गुब्बारों पर नुकीले पेन से नंबर लिखवाना, एक तीली से मोमबत्ती जलाना, टंगट्विस्टर बुलवाना, फोटो में बिंदी लगवाना, सुई में धागा डलवाना, पानी से भरी हुई बाल्टी में रखी हुई कटोरी में सिक्के डालना आदि।
जैसे जैसे शाम गुजर रही थी, हमारे बाबा दादियों की हंसी, ठहाके और उत्साह भी बढ़ रहा था। कुछ हमसे लड़ रहे थे कि एक मिनट अभी पूरा


6 दिसंबर
नहीं हुआ है, तो कुछ गिफ्ट में मिलने वाली चाॅकलेट की जिद कर रहे थे। बुढ़ापे में बचपने की सिर्फ बातें सुनी थीं, उस दिन हमने देख भी लीं।
इस मस्ती और ठहाकों के बीच हमें पता चला कि कुछ बाबा दादियों की तबियत कुछ नासाज़ है। इसी बीच हमारे एक नज़दीकी ने हमसे संपर्क किया कि वे अपनी बेटी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में हमारे बाबा दादियों के लिये कुछ करना चाहते थे। हमारे सुझाव को उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और वहां ब्लडप्रेषर और शुगर की जांच का शिविर लगा दिया। जांच के दौरान हमने देखा कि कई बाबा दादियों की शुगर और ब्लडप्रेषर काफी बढ़ा हुआ था। हमें और भी उनकी तकलीफों का पता चला, जैसे हड्डियों की तकलीफ, आंखों की दिक्कत और कई छोटी बड़ी बीमारियां। हमें भी लगा कि इस उम्र में लगातार जांच होती रहनी चाहिये और इसी की शुरूवात हमने की है, उनकी तकलीफ कम करने के लिये...उम्मीद करते हैं हमारी ये पहल भी सार्थक हो।


हमारी मुलाकातों की वर्षगांठ और नये साल का स्वागत
रचिता टंडन
पिछली बार बिदाई के समय हमसे हमारे बाबा दादियों ने एक वादा लिया था वो ये कि नये साल पर और हमारे इन बुजुर्गों से मिलने के एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में हम कुछ न करें....बस जनवरी के पहले रविवार की दोपहर का भोजन उनके साथ बैठकर करें। भोजन वे लोग बनायेंगे और हमें खिलायेंगे। हमने भी खुषी खषी ये निमंत्रण स्वीकार कर लिया।
3 जनवरी यानि नये साल का पहला रविवार, हम पहुंच गये नये साल का जष्न मनाने, उनके साथ लंच करने। जब हम वहां सुबह 11 बजे पहुंचे, तो हमारा इंतजार हो रहा था। खाना बन चुका था, पंगत बिछ चुकी थी और पकवान परसने को वे तैयार बैठे थे। हमारे उनके बीच नये साल की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ। उन्होंने हमें मुबारकबाद दी और हमने भी कामना की कि उनका ये साल हंसते-हंसते और खुषी से गुज़रे।
थाली पूरी भरी हुई थी...परोसा गया था पूड़ी, आलू की सब्जी, दाल, टमाटर की चटनी, दही बड़ा, पुलाव, सलाद, पापड़ और हलवा। पेट भरने के बाद भी हम खाते गये ....खाना इतना स्वादिष्ट जो था। खाने के बाद हमने मनाया जष्न...खेली अंत्याक्षरी...एक तरफ थे हम और दूसरी तरफ थे हमारे बाबा दादी। एक के बाद एक गानों की कतार.....पर आखिरी में हम जीत गये।
इस बीच डाॅ.योगी ने पिछली बार अधिक शुगर और ब्लडप्रेषर वाले 12 लोगों को फिर से जांचा परखा....उनकी पर्ची बनायी, दवायें दीं।


3 जनवरीचलते चलते बुजुर्गों की तरफ से एक फरमाइष आई कि हमें पिक्चर ले चलो....हम भी मान गये और झट से 7 तारीख का प्रोग्राम बना डाला...
सिर्फ 3 दिन बाद ही आ गई 7 तारीख, तब तक पीवीआर में व्यवस्था...उनको पीवीआर तक ले जाने की व्यवस्था और उनके उनके खाने की व्यवस्था कर ली गई और नया साल व हमारी मुलाकात का वार्षिक सम्मेलन संपन्न हुआ 64 लोगों द्वारा फिल्म ‘दिलवाले’ देखकर।

Download your payment receipt
(Bank transfer, QR Code donations)

Rs.152 raised

Goal: Rs.2,000,000

Beneficiary: Libra Welfare S... info_outline
Only INR donations accepted

Supporters (3)

Y
Yash donated Rs.100

Ye garima k dwara chhoti si madad.

A
Anonymous donated Rs.51
A
Anonymous donated Rs.1