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                         पंचवटी 
अध्यात्म से विज्ञान तकप्रकृति के साथ छेड़छाड़ शहरीकरण एवं औद्योगिकरण के चलते लगातार पेड़ों का दोहन ने मानव सभ्यता को विनाश के रास्ते पर खड़ा कर दिया है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक जीव - जंतु धरती से विलुप्त हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के एक अनुमान के अनुसार सदी के अंत तक अगर पृथ्वी का तापमान 1.5 से 2.7 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है जिससे पौधों पक्षियों और जीवो की करीब 20 से 30 प्रतिसत प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाएगी। आज पर्यावरण संतुलन के विश्व भर में अनेक कार्यक्रम चल रही है। परन्तु आज आवश्यकता है एक छोटी सी पहल की ‘’पंचवटी’’ जिसे इतिहास से विज्ञान तक पर्यावरण संतुलन एवं जैव विविधता के लिए लोहा माना है। सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने भी इस रहस्य को जानने के लिए अपने शोध में रामायण के उस पंचवटी को शामिल किया जहां भगवान श्री राम ने वनवास के 14 वर्षों में निरोग एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत किए थे। वैज्ञानिकों ने पंचवटी में शामिल पांच वृक्ष पीपल, बरगद, आंवला, बेल एवं अशोक पर अलग-अलग शोध किया। शोध के बाद जो परिणाम आए वो बेहद चौंकाने वाले थे। पंचवटी के आसपास रहने से बीमारियों की आशंका कम हो जाती है और मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।हमारे पौराणिक ग्रन्थों में ''पंच" (पांच) शब्द का बड़ा महत्व है,''पंचभूत" (पांच तत्वों) पृथ्वी, जल, तेज (अग्री), वायु और आकाश से सृष्टि का निर्माण हुआ है। मानव शरीर को पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, त्वचा, चक्षु, नासिका, जिह्वा श्रोत (कान) एवं पांच कर्मेन्द्रियाँ पूर्ण करती हैं। ठीक इसी प्रकार पंचवटी का पांच प्रजातियों पीपल, बरगद, बेल, अशोक व आंवला पर्यावरणीय पूर्णता की प्रतीक है।अगर ग्रामीण क्षेत्र के अनुपयोगी भूमि पर यह पंचवटी लगाया जाये तो एक मिल का पत्थर साबित होगा|
पंचवटी का निर्माण सर्वप्रथम किसी समतल स्थान का चयन करना चाहिए। फिर केन्द्र से चारों दिशाओं में बीस- बीस हाथ (10 -10 मीटर) पर निशान लगायें तथा पूरब एवं दक्षिण दिशा के मध्य अर्थाथ अग्रि कोण पर भी बीस हाथ (10 मीटर) पर मध्य में एक निशान लगा लें। इन चिन्हित किये गये जगहों पर गड्ढा बना लें। इनमें पूरब दिशा में पीपल, दक्षिण दिशा में आंवला, उत्तर दिशा में बेल, पश्चिम दिशा में वट वृक्ष (बरगद) एवं अग्रिकोण पर अशोक वृक्ष की स्थापना पवित्र मन से करें। पांच वर्ष पश्चात केन्द्र में चार हाथ लम्बा एवं चार हाथ चौड़ा (2/2 मी.) का वर्गाकार सुन्दर वेदी का निर्माण करना चाहिए। वेदी सब ओर समतल होना चाहिए एवं चारों दिशाओं में इसका मुख होना चाहिए। महत्त्व स्कन्द पुराण में वर्णित पंचवटी का वैज्ञानिक विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि इसकी संरचना में गम्भीर आयुर्वेद, मनोविज्ञान, औद्यानिकी वानिकी, वास्तुशास्त्र एवं पर्यावरण संरक्षण के ज्ञान का उपयोग हुआ है।
पंचवटी के औषधीय महत्व:- इन पांचों वृक्ष के अद्वितीय औषधीय गुण है। इनमें वे समस्त गुण निहित हैं जिससे मनुष्य दीर्घायु रहकर अपने समस्त रोगों का निदान कर सकता है। इन पांच वृक्षों में अतुलनीय औषधीय गुण है आंवला विटामिन ‘’सी’’ का सबसे अच्छा स्रोत है और शरीर को शरीर को रोग प्रतिरोधक बनाने की महौषधि है| आंवला प्रमेह, दाह, कामला कुष्ठ, अम्लपित्त और खासी इत्यादि रोगों को नष्ट करता है| शीत ऋतु में शरीर के ताप एवं ऊर्जा को आंवला पूरा करता है बरगद का दूध बहुत ही बलदायी होता है|पितनाशक रक्तशोधक एवं शुक्रस्तम्भक होता है| पीपल विदनाशक शोधहर और वाजीकरण होता है| बेल पेट संबंधी सभी बीमारियों का अचूक औषधि है| बेल मधुमेह, अतिसार, श्वेतप्रदर वात एवं कफ नाशक तथा आंत के लिए बल्य है| अशोक अशोक स्त्री रोग को दूर करने वाला महा-औषधि है या गर्भाशय की शिथिलता सभी प्रदर रोग, ज्वर एवं रक्त विकार नाशक है|
धार्मिक महत्व:- धार्मिक महत्व के अनुसार बेल पर भगवान शंकर का वास माना गया है तो पीपल पर विष्णु एवं वट वृक्ष पर ब्रह्मा का वास माना गया है| इस प्रकार पंचवटी में त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास एवं एक ही स्थल पर तीनों का पूजन का लाभ मिलता है| स्कन्द पुराण में वर्णित पंचवटी का वैज्ञानिक विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि इसकी संरचना में गम्भीर आयुर्वेद, मनोविज्ञान, वानिकी, वास्तुशास्त्र एवं पर्यावरण संरक्षण के ज्ञान का उपयोग हुआ है। रामायण में भी उल्लेख किया गया है कि भगवान श्री राम सीता और लक्ष्मण के साथ पंचवटी के बीच ही पर्णशाला बनाकर 14 वर्ष वनवास गुजारे पद्यमपुराण के सृष्टि खंड में भगवान विष्णु ने पंचवटी में वर्णित पेड़ एवं इसके फल को सबसे पवित्र माना है| कहते हैं कि इसके रोपण करने से मनुष्य जीवन मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाता है|
जैव-विविधता का महत्व :- पंचवटी में हमेशा फल उपलब्ध होने से पक्षियों एवं अन्य छोटे जीव जंतुओं के लिए भोजन उपलब्ध रहता है| पीपल व बेल का फल ग्रीष्म ऋतिु में पकता है तो बरगद का वर्षाकाल एवं आंवला का जाड़े में।जिसके कारण स्थाई निवास करते हैं स्थाई निवास करते हैं पीपल एवं बरगद कोमल होने के कारण पक्षियों के घोंसले के लिए उपयुक्त है| पंचवटी की पांच वृक्षों की छाया तेजोवलय, औषधीयगुण, पर्यावरणीय एवं अन्य विशिष्ट गुणों का समन्वय एक निश्चित अनुपात, मात्रा एवं तीव्रता के साथ सूर्य व चन्द्र के प्रकाश में होने से विशिष्टता प्राप्त करता है| पंचवटी पर्यावरण एवं पक्षियों के लुप्त होती संख्या को बचाने के लिए एक छोटी पर सार्थक पहल है|
आय - ब्यय का विवरण :-
भूमि की तैयारी                                                                     500 रु.
पंचवटी के पांच पौधे (बेल,बरगद, पीपल, आंवला,और अशोक ) 350 रु. 
पौधे के सुरक्षा के लिए घेराबंदी 5 फिट /पौधा 200 *5             1000 रु.
 सिचाई एव सुरक्षा 6 महिना तक / महिना 500 *6                  3000 रु.
 अन्य खर्च                                                                             150रु.
 कुल खर्च / पंचवटी :- ( पांच हजार रु. )                                 5000रु.
100 पंचवटी के लिए 100*5000 = 500000( पांच लाख रु.)

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